अनुभवहीन और नोन बैंकिंग बैकग्राउंड वाले अफसरों के हाथ में 8 केंद्रीय सहकारी बैंकों की कमान, ऐसे आएगी सहकार से समृद्धि?

सहकारिता मंत्री गौतम दक से सवाल – ये राजनीतिक मजबूरी या आर्थिक स्वार्थ?

सहकार भारत
बीकानेर, 16 मई। सुशासन और पारदर्शिता के ऊंचे बोल बोलने वाली कथित आदर्शवादी राजस्थान की भजनलाल सरकार ने प्रदेश के केंद्रीय सहकारी बैंकों को गर्त में धकेलना शुरू कर दिया है। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक और नाबार्ड के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद, नोन-बैंकिंग बैकग्राउंड वाले एवं अनुभवहीन सहकारी अफसर के हाथों में 8 केंद्रीय सहकारी बैंकों की कमान सौंप रखी है। समयबद्ध पदोन्नति के आधार पर सहकारी निरीक्षक से सहकारिता सेवा के अधिकारी बने इन अफसरों को आगे लाकर, सरकार ने न केवल अनुभवी ज्वाइंट रजिस्ट्रारों और ऊर्जा से भरपूर युवा उप-रजिस्ट्रारों को हतोत्साहित करने का काम किया है, बल्कि सहकारी बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया है।

31 मार्च 2025 की स्थिति में राजस्थान के 8 केंद्रीय सहकारी बैंकों की कमान अनुभवहीन और नोन बैंकिंग बैकग्राउंड वाले सहकारी अफसरों के पास है, जिन्होंने एमबीए या बैंकिंग की किसी भी विधा में पीजी डिप्लोमा होना तो दूर, कभी कॉमर्स का विषय ही नहीं पढ़ा। इनमें अजमेर केंद्रीय सहकारी बैंक में हरीश सिवासिया, अलवर केंद्रीय सहकारी बैंक में देवीदास बैरवा, बांसवाड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक में परेश पण्डया, बारां केंद्रीय सहकारी बैंक में सौमित्र कुमार मंगल, बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक में वासुदेव पालीवाल, बूंदी केंद्रीय सहकारी बैंक में मुकेश मोहन गर्ग, हनुमानगढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक में नरेश शुक्ला, टोंक केंद्रीय सहकारी बैैंक में छोटेलाल बुनकर और डूंगरपुर केंद्रीय सहकारी बैंक में राजकुमार खांडिया बतौर प्रबंध निदेशक कार्यरत हैं।

आठों अफसर निरीक्षक से प्रमोटी

ये सभी सहकारिता विभाग में निरीक्षक बनकर आये और फिर समयबद्ध प्रमोशन लेकर पहले सहायक रजिस्ट्रार, फिर उप रजिस्ट्रार बन गये। इनमें अधिकांश अफसर एक-दो साल में ही उप रजिस्ट्रार बने हैं। इसमें से एक भी अधिकारी आरबीआई के फिट एंड प्रोपर क्राइटेरिया यानी उचित एवं योग्य मानदंडों पर खरा नहीं उतरता। ऐसे में सवाल ये उठता है कि सरकार के सामने ऐसी क्या मजबूरी है जो उसे ऐसे अनुभवहीन अफसरों के हाथ में ही केंद्रीय सहकारी बैंकों के प्रबंधन की कमान सौंपनी पड़ रही है। यदि इसका उत्तर राजनीतिक दबाव (डिजायर सिस्टम) है, तो यह और भी गंभीर विषय है क्योंकि आप किसी सरकारी दफ्तर की नहीं, बल्कि बैंकों का दायित्व सौंप रहे हैं, जो शॉर्ट टर्म लोनिंग सेक्टर का सबसे बड़ा माध्यम है।

नरेश शुक्ला

अफसोस की बात है कि एक को छोडक़र, शेष सभी अधिकारी जीवन के कम से कम 50 बसंत देख चुके हैं, लेकिन किसी के पास भी पर्याप्त अनुभव नहीं है। हनुमानगढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक पद पर कार्यरत नरेश शुक्ला के पास तो इससे पहले एक दिन भी बैंक चलाने का अनुभव नहीं है। वे कभी किसी बैंक में अधिशासी अधिकारी भी नहीं रहे, लेकिन सरकार ने 58 साल के शुक्ला को सीधे हनुमानगढ़ सीसीबी का प्रबंध निदेशक बना दिया। धन्य हैं सहकारिता मंत्री गौतम दक और सहकारिता विभाग की कथित तेजतर्रार प्रमुख शासन सचिव श्रीमती मंजू राजपाल, जिन्होंने ऐसे शून्य अनुभव वाले अफसर को सीसीबी का दायित्व सौंप दिया। ऐसे निर्णयों से इन अफसरों की प्रशासनिक कुशलता के भी दर्शन हो रहे हैं।

वासुदेव पालीवाल

ऐसे ही दूसरे अफसर वासुदेव पालीवाल हैं, जो अभी बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक में कार्यरत हैं। पालीवाल की उम्र 56 साल और 8 माह है, उनके पास पांच साल का बैंकिंग का अनुभव है, लेकिन वे इससे पहले केंद्रीय सहकारी बैंक में कभी प्रबंध निदेशक नहीं रहे।

देवीदास बैरवा

अलवर बैंक में कार्यरत देवीदास बैरवा ने अलवर क्षेत्र में ही विशेष लेखा परीक्षक कार्यालय में निरीक्षक ऑडिट रहते हुए जीवन के 48 से अधिक बसंत बिता दिये। दो साल पहले प्रमोशन पाकर सहायक रजिस्ट्रार बनने पर विशेष लेखा परीक्षक कार्यालय में अपनी योग्यता दर्शाने की अपेक्षा, राजनीतिक अप्रोच से सीधे अलवर सीसीबी में अधिशासी अधिकारी बन कर आये। फिर प्रबंध निदेशक का पद रिक्त हुआ, तो एमडीशिप भी मिल गयी। उनके पास 1 साल 6 महीने का बैंकिंग का अनुभव है, जो उन्हें इसी बैंक में रहते हुए प्राप्त हुआ है। वे अभी उप रजिस्ट्रार हैं।

परेश, मुकेश और सौमित्र

बांसवाड़ा केेंद्रीय सहकारी बैंक में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्यरत 50 साल के परेश पण्डया, उप रजिस्ट्रार के पास कुल 9 माह का बैंकिंग का अनुभव है, जो इन्हें वर्तमान में बांसवाड़ा और इससे पहले बारां सीसीबी में काम करते हुए मिला है। बूंदी सीसीबी में एमडी के रूप में कार्यरत 54 साल के मुकेश मोहन गर्ग, उप रजिस्ट्रार के पास भी मात्र एक साल 6 महीने का बैंकिंग का अनुभव है, जो इसी बैंक में प्राप्त हुआ है। बारां केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक सौमित्रकुमार मंगल, उप रजिस्ट्रार 54 बसंत देख चुके हैं। लेकिन बैंकिंग का अनुभव 1 साल 6 माह का है। शायद इसी बैंक में मिला है।

हरीश सिवासिया

इनके अलावा 50 साल के हरीश सिवासिया, उप रजिस्ट्रार के पास 5 साल का बैंकिंग का अनुभव बताया जा रहा है। वे वर्तमान में अजमेर सीसीबी में कार्यरत हैं जबकि इससे पहले, उदयपुर सीसीबी में कार्यवाहक एमडी के रूप में काम कर चुके हैं। गौतम दक की नजर में वे डिक्टेंशन माक्र्स वाली योग्तया रखते हैं। यही कारण है कि एक समय हरीश सिवासिया उदयपुर में वन मैन शो थे। वे तब उदयपुर में क्षेत्रीय अंकेक्षण अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। उदयपुर सीसीबी के तत्कालिन एमडी आलोक चौधरी को बांसवाड़ा भेज दिये जाने और प्रेमप्रकाश मण्डोत के अतिरिक्त रजिस्ट्रार खंड उदयपुर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद, सरकार द्वारा हरीश सिवासिया के मबजूत कंधों पर आरएओ के साथ-साथ सीसीबी एमडी और खंड के अतिरिक्त रजिस्ट्रार की भारी-भरकम जिम्मेदारी डाल दी गयी थी।

राजकुमार खांडिया

इन्स्पेक्टर से प्रमोट होकर उप रजिस्ट्रार बनने और फिर सीसीबी की कमान संभालने वाले 8 भाग्यशाली अफसरों में 47 साल के राजकुमार खांडिया सबसे युवा हैं। वे डूंगरपुर सीसीबी में एमडी हैं। उनके पास दो साल का अनुभव बताया जा रहा है, जबकि वे पहले कभी किसी सीसीबी में एमडी पद पर नहीं रहे। खांडिया इससे पहले, राजस्थान के सबसे बड़े सहकारी भंडारों में शुमार, उदयपुर सहकारी उपभोक्ता थोक भंडार के जीएम थे। उन्हें आशुतोष भट्ट के स्थान पर इस पद की जिम्मेदारी दी गयी थी, जो प्रमोशन पाकर एडिशनल रजिस्ट्रार बन गये थे। सरकार ने उन्हें जयपुर भेजा लेकिन होम सिकनेस का शिकार होकर वे अपने कैडर से दो पायदान नीचे, क्षेत्रीय अंकेक्षण अधिकारी, उदयपुर के पद पर लग गये। भट्ट से पहले, उप रजिस्ट्रार हरीश सिवासिया उदयपुर में आरएओ थे।

एकेडमिक शिक्षा

हरीश सिवासिया बीएससी, एमए हैं।

देवीदास बैरवा एमए हैं।

परेश पण्डया एमए हैं।

सौमित्र कुमार मंगल बीएससी हैं।

वासुदेव पालीवाल और मुकेश मोहन गर्ग स्नातकोत्तर हैं। विभाग को नहीं पता कि ये दोनों किस विषय में पोस्ट ग्रेजुएट हैं।

नरेश शुक्ला बी.काम हैं, लेकिन उनका बैंकिंग अनुभव कोरे कागज समान है।

राजकुमार खांडिया एमएससी, एमए हैं।

उपरोक्त आठ अफसरों में से एक भी अधिकारी प्रबंध निदेशक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक के उचित एवं योग्य मानदंडों पर खरा नहीं उतरता।

 

भजनलाल सरकार के मंत्रियों के बीच तलवारें खिंचवा रहे हैं सहकारी अफसर

 

 

Related Posts

बड़बोले गौतम दक के राज में दागी सहकारी अफसरों की मौज

आइये आज आप राजस्थान के बड़बोले सहकारिता मंत्री गौतम दक से मिलाते हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और दागी अफसरों को फील्ड पोस्टिंग नहीं देने जैसे बड़ी-बड़ी डींगे…

लखियां की सोसाइटी पर लगे आरोपों को सहकारिता विभाग ने माना गंभीर, अधिनियम अंतर्गत जांच का आदेश

सहकार भारत बीकानेर, 19 सितम्बर। सहकारिता विभाग की प्रमुख शासन सचिव और सहकारिता रजिस्ट्रार श्रीमती मंजू राजपाल के खिलाफ हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने वाले श्रीगंगानगर जिले के…