
पाठक के कुप्रबंधन की पाठशाला – चैप्टर वन
सहकार भारत
जयपुर, 11 अगस्त। राज्य के सबसे बड़े सहकारी बैंक कहे जाने वाले राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक), जयपुर में अराजकता राज कर रही है। टोंक रोड पर सीना ताने खड़ी, शीशे से लदकद अपेक्स बैंक की सात मंजिला बिल्डिंग सहकारी आंदोलन की शान की प्रतीक कही जाती है। इसी बिल्डिंग में सहकारिता मंत्री गौतम दक की अदालत लगती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा की तेजतर्रार अधिकारी मंजू राजपाल, पूरी ब्यूरोक्रेसी जिनकी कठोर प्रशासकीय क्षमता का लोहा मानती है, वे सहकारिता विभाग की प्रमुख शासन सचिव होने के नाते अपेक्स बैंक प्रशासक हैं।
मंजू राजपाल का सामना करने की कल्पाना मात्र से सहकारी अफसरों की धडक़न अनियंत्रित हो जाती हैं, लेकिन अपेक्स बैंक में मंजू राजपाल की कार्यशैली की छाप नजर नहीं आ रही। साल भर से, जब से यहां प्रबंध निदेशक के रूप में संजय पाठक की नियुक्ति हुई है, तब से प्रबंधकीय दृष्टि से सब कुछ अस्त व्यस्त चल रहा है। पांच रुपये वाला गुटखा चबाने के शौकीन संजय पाठक की रीति-नीति से, यह लग ही नहीं रहा कि राज्य का यह शीर्ष सहकारी बैंक प्रदेश के अल्पकालीन साख ढांचे की नुमाईंदगी कर रहा है।
तबादला नीति लागू नहीं कर रहे
आईएएस मंजू राजपाल द्वारा कई बार संजय पाठक को आड़े हाथों लेने के बावजूद, पाठक ने आज तक अपेक्स बैंक में तबादला नीति को लागू नहीं किया। यही कारण है कि बैंक के एक-एक अनुभाग में दो-दो डीजीएम कार्यरत हैं, लेकिन अपेक्स बैंक के चारों रीजनल ऑफिस बाबुओं और मैनेजरों के भरोसे चलाये जा रहे हैं। ऐसे रीजनल ऑफिस, जिनपर अपने संभाग के जिलों में सहकारिता को पल्वित, पोषित करने, सहकारी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने, पैक्स एवं डीसीसीबी के निरीक्षण, पर्यवेक्षण, डीपीसी करवाने की भारी-भरकम जिम्मेदारी है।
रीजनल ऑफिस में लगाये जाने वाले डीजीएम और एजीएम को अपेक्स बैंक के प्रधान कार्यालय में नियोजित कर रखा है। जिस किसी अफसर को पिछले महीनों में रीजनल ऑफिस में लगाया गया था, उसे बहाने से प्रधान कार्यालय बुलाकर, एयरकंडीशंड कमरों की शीतल वायु का लाभ प्रदान किया जा रहा है। रीजनल ऑफिस में एजीएम और डीजीएम के पद सृजित कर, उसी आधार पर पदोन्नति का लाभ दिया गया, लेकिन एजीएम, डीजीएम को कभी रीजनल ऑफिस में नहीं भेजा जाता। दो से तीन लाख रुपये महीने का मासिक वेतन लेने वाले ऐसे एजीएम, डीजीएम, प्रधान कार्यालय में बैठकर सहकारी अफसरों की चरण चाकरी करते देखे जा सकते हैं।
बायोमैट्रिक हाजिरी में दोहरा रवैया
अपेक्स बैंक में पूरे स्टाफ के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी लगाना अनिवार्य है, इसके लिए स्वागत कक्ष के पास बायामैट्रिक मशीन लगी हुई है, लेकिन सहकारी अफसर इस पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराते। क्यों नहीं कराते, क्योंकि वे कभी समय पर आते ही नहीं और समय से पहले निकल जाते हैं। एक अफसर का तो बंगला बन रहा है, इसलिए वे बैंक के वाहन से बंगले का निरीक्षण करने के उपरांत प्रधान कार्यालय में अवतरित होते हैं। तब तक, बायोमैट्रिक मशीन में उपस्थिति दर्ज कराने का निर्धारित समय निकल जाता है, इसलिए पाठक ने उन्हें बायोमैट्रिक से मुक्त कर रखा है। उनकी भांति सहकारिता सेवा के अन्य अधिकारी, जो डेपुटेशन पर अपेक्स बैंक में कार्यरत हैं, वे भी बायोमैट्रिक हाजिरी से मुक्त हैं। केवल एक, राकेश शर्मा, उप रजिस्ट्रार को छोडक़र।
राकेश शर्मा पर पाठक की वक्रदृष्टि
सजातीय होने के बावजूद संजय पाठक को उप रजिस्ट्रार राकेश शर्मा फूटी आंख नहीं भाते। राकेश शर्मा को राज्य सरकार ने अपेक्स बैंक में डेपुटेशन पर लगा रखा है, लेकिन पाठक ने उन्हें बैठने के लिए कमरा नहीं दे रखा। उनके पास कोई स्टाफ नहीं है। कमरा और स्टाफ क्यों नहीं है, क्योंकि संजय पाठक ने पिछले एक साल में कभी राकेश शर्मा को अपेक्स बैंक में टिकने ही नहीं दिया। जांचों के नाम पर प्रदेश में अलग-अलग केंद्रीय सहकारी बैंकों में भेजा जाता रहा है। यही राकेश शर्मा, अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 के नोडल अफसर हैं।
शर्मा की सीट पर जिगरी यार को बैठाया
संजय पाठक के राज्य सहकारी बैंक में एमडी बनने से पहले, राकेश शर्मा, अपेक्स बैंक में उप महाप्रबंधक (प्रशासनिक एवं कार्मिक अनुभाग) हुआ करते थे। एमडी बनने के बाद संजय पाठक अपने जिगरी मित्र ललित मीणा, सहायक रजिस्ट्रार (एसीबी से ट्रेप्ड) को बैंक में लेकर आये और उन्हें राकेश शर्मा की सीट पर बैठाकर, जांच के नाम पर राकेश शर्मा को कभी भरतपुर तो कभी जैसलमेर भेजा जाता रहा। पाठक ने शर्मा को अपेक्स बैंक से रिलीव भी करने की कोशिश की, आदेश भी जारी कर दिया, ताकि राकेश शर्मा को टीए, डीए नहीं देना पड़े। लेकिन जब उन्हें बताया गया कि सहकारी अफसर को रिलीव करना एमडी के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तब पाठक ने अपना थूका हुआ चाटा और आदेश वापिस लिया।
करोड़ों रुपये के बिल पास करते हैं ललित मीणा
राकेश शर्मा की डीजीएम (एएंडपी) से रवानगी के बाद से ललित मीणा ही अपेक्स बैंक के लाखों-करोड़ों रुपये के बिल पास कर रहे हैं। वह भी तब, जब सहकारिता मंत्री गौतम दक यह स्पष्ट कर चुके हैं, कि विवादों में लिप्त अफसरों की वित्तीय शक्तियां छीन ली जायें। ललित मीणा पर बिलों को पास करने के भारी-भरकम बोझ और निर्माणाधीन बंगले की देखरेख को दृष्टिगत रखते हुए संजय पाठक ने मीणा को बैंक की ओर से कार उपलब्ध करा रखी है जबकि डीजीएम को चौपहिया वाहन की सुविधा देय नहीं है।
अमान्य डिग्रियों की जांच दबाये बैठे हैं
बैंक के बड़े अफसरों द्वारा दुरस्थ शिक्षा से प्राप्त एमएससी (आईटी) की डिग्रियों का विवाद लम्बे समय से संजय पाठक के पास लम्बित है। इसे लेकर हाल ही में करायी गयी जांच रिपोर्ट को भी पाठक ने दबा रखा है। बैंक के कानूनी सलाहकार ने दुरुस्थ शिक्षा से एमएससी (आईटी) की डिग्रियां, जिसे सुप्रीम कोर्ट अमान्य करार दे चुका है, लेने वाले कार्मिकों के खिलाफ पुलिस केस करने की अनुशंसा की है, लेकिन पाठक ऐसा नहीं कर रहे। प्रशासक मंजू राजपाल द्वारा कई बार हडक़ाये जाने के बावजूद वे पूरी ढीठता से इस मामले को दबाये बैठे हैं। क्योंकि इस मामले में अधिकांश वे ही लोग फंसते दिख रहे हैं, जिनका नाम चरण-चाकरी वाली लिस्ट में है। मंत्री की मंशा और प्रशासक के निर्देश के बावजूद संजय पाठक, अपेक्स बैंक में तबादला नीति भी लागू नहीं कर रहे।
जवाब मांगते सुलगते सवाल
अब सवाल ये है कि इतना सब कुछ मंजू राजपाल जैसी कठोर प्रशासक की नाक के नीचे कैसे हो रहा है? सहकारिता सेवा के धुरंधर अफसरों की लगाम खींच कर रखने वाली मंजू राजपाल, अपेक्स बैंक की प्रशासक हैं, लेकिन बैंक का एम.डी. कई मामलों में नियमों को धत्ता बताकर मनमानी कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट दूरस्थ शिक्षा से प्राप्त तकनीकी डिग्रियों को अमान्य करार दे चुका है और यूजीसी जिन विश्वविद्यालयों को तकनीकी डिग्रियों के लिए अपात्र घोषित कर चुका है, ऐसी यूनिसर्विटीज से एमएससी (आईटी) की तकनीकी डिग्री लेकर दो-दो वेतनवृद्धियों का अनुचित लाभ लेने वाले दोषी बैंक अधिकारियों, कर्मचारियों पर कार्यवाही क्यों नहीं हो रही?
नियमों को ताक में रखकर एक दागी अफसर को करोड़ों रुपये के बिल पास करने वाली सीट पर क्यों बैठाया गया है? खेल और सांस्कृतिक संध्या में नाम पर सहकारी बैंकों और सहकारी संस्थाओं से उगाहे गये पचास लाख रुपये का गोलमाल करने वाले, आय और व्यय की ऑडिट नहीं करवाने वाले और आज तक स्मारिका का प्रकाशन नहीं करने वाले स्पेक्ट्रम के कर्ताधर्ताओं से अब तक हिसाब क्यों नहीं लिया गया? लाखों रुपये वेतन दे रहा है तो फिर क्षेत्रीय कार्यालयों में स्वीकृत पदों के अनुरूप एजीएम-डीजीएम को क्यों नहीं लगाया जा रहा?
54 करोड़ रुपये के जीएसटी मामले में मौन
फसली ऋण लेने वाले किसानों के जीवन सुरक्षा बीमा मामले में 54 करोड़ रुपये की जीएसटी की हेराफेरी करने वाली बीमा कम्पनी के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं हो रही, जबकि इस मामले की जांच टीम में स्वयं संजय पाठक शामिल थे और जांच टीम को अपनी रिपोर्ट दिये दो माह से अधिक समय हो चुका है? अपेक्स बैंक में नियोजित सहकारिता सेवा के अफसरों को बायोमैट्रिक हाजरी के लिए पाबंद क्यों नहीं किया जा रहा? डीजीएम को कार की सुविधा उपलब्ध कराने से पहले किसकी अनुमति ली गयी? सहकारिता के जानकारों के बीच यह चर्चा का विषय है कि पाठक के इस दुस्साहन के पीछे कौनसी ताकत काम कर रही है, क्योंकि तमाम सहकारी महकमा यह बाखूबी वाकिफ है कि मंजू राजपाल के सामने ऐसा रिस्क लेने की कुव्वत संजय पाठक में तो नहीं है। (शेष, पाठक के कुप्रबंधन की पाठशाला की द्वितीय किश्त में)
(समाचार में प्रदर्शित चित्र सोशल मीडिया से लिये गये हैं)






