क्या पैक्स कर्मचारियों को जानबूझकर भजनलाल शर्मा सरकार के खिलाफ खड़ा किया गया है?

परिस्थितियां बता रही हैं कि अपने ही लोगों ने सीएम भजनलाल शर्मा को और सरकार को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा

सहकार भारत

बीकानेर, 29 मार्च। एक ओर भारत सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह देश को सहकारिता के माध्यम से समृद्धि की ओर ले जाने को कृतसंकल्पित दिखाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के सहकारिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गौतम दक के अहंकारी रवैये और सरकार को गुमराह करने में माहिर सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख को खराब करने के लिए ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स) के हजारों कर्मचारियों को जबरन अनिश्चितकालीन हड़ताल पर धकेल दिया है।

पैक्स कर्मचारियों की हड़ताल से प्रदेश के लाखों किसान दो दिन बाद, डिफाल्टर होकर राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ब्याजमुक्त अल्पकालीन सहकारी ऋण सुविधा से वंचित हो जायेंगे। इन लाखों किसानों को 9 प्रतिशत ब्याज सहित ऋण की राशि का चुकारा करना होगा वरना वे ब्याजमुक्त ऋण योजना के लाभ से वंचित हो जायेंगे।

हड़ताल के दौरान भी पैक्स कर्मचारी लगातार गौतम दक और सरकार के विभिन्न मंत्रियों को ज्ञापन दे रहे हैं, लेकिन इसका कोई असर नहीं हो रहा। रविवार को गौतम दक के गृहजिले चित्तौडग़ढ़ के पैक्स कर्मचारियों ने भी मंत्री को ज्ञापन सौंपा, लेकिन मिला केवल आश्वासन। पैक्स कर्मचारियों को मंत्री के रवैये से यूं लग ही नहीं कि वे हड़ताल समाप्त कराने की इच्छा भी रखते हैं।

चित्तौडग़ढ़ में पैक्स कर्मचारी सहकारिता राज्यमंत्री गौतम दक को ज्ञापन सौंपते हुए।

हड़ताली कर्मचारियों के साथ मंत्री की बेरुखी

पैक्स कर्मचारियों की बेमियादी हड़ताल (कार्य बहिष्कार) 27 फरवरी 2026 से जारी है, लेकिन इस अवधि में सहकारिता मंत्री गौतम दक या सहकारी विभाग के अधिकारियों ने कभी इस हड़ताल को समाप्त करवाने का संजीदगी से प्रयास नहीं किया। उल्टे, पिछले महीने जब पैक्स कर्मचारियों की संयुक्त संघर्ष समिति ने जयपुर में नेहरू सहकार भवन के समक्ष एक दिन का धरना एवं प्रदर्शन आयोजित किया, जब ज्ञापन देने पहुंचे पैक्स संगठनों के पदाधिकारियों के साथ सहकारिता मंत्री गौतम दक ने दोयम दर्जे का व्यवहार किया। आंदोलन की आग पर मधुर वचन और आश्वासन के ठंडे छींटे मारने की बजाय, स्क्रीनिंग में भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाये। मंत्री के व्यवहार से उखड़े पैक्स कार्मिक, अपनी मांगे पूरी होने तक बेमियादी कार्य बहिष्कार पर अड़ गये और उन्होंने ऋण वसूली का बहिष्कार जारी रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों किसान ब्याजमुक्त अल्पकालीन फसली ऋण को नया-पुराना करने की सुविधा से वंचित हो गये।

सहकारी बैंकों में जुट रही किसानों की भारी भीड़

ग्राम सेवा सहकारी समितियों में ऋण की वसूली नहीं होने से लाखों किसान केंद्रीय सहकारी बैंकों की शाखाओं में जुट रहे हैं। जोधपुर केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रधान कार्यालय के समक्ष हजारों किसानों के जुटने से कानून-व्यवस्था की स्थिति को खतरा उत्पन्न हो गया, जिसके चलते बैंक के प्रबंध निदेशक अनिल बिश्नोई (जिनके पास जोधपुर से 200 किलोमीटर दूर बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक के पद का अतिरिक्त प्रभार भी है) ने पुलिस की सहायता से स्थिति को नियंत्रित करवाया।

मंत्री व अफसरों का रवैया नकारात्मक

सहकारिता मंत्री गौतम दक और नेहरू सहकार भवन के वातानुकूलित कमरों में बैठे नौसिखिये अफसरों ने, जिनमें से अधिकांश ने कभी फील्ड में काम नहीं किया होगा, ने फसली ऋण वसूली की अंतिम तारीख (31 मार्च 2026) नजदीक होने के बावजूद हड़ताली कर्मचारियों को शांत करने का बुद्धिमतापूर्ण प्रयास नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि आर्थिक रूप से बेहद नाजुक अवसर पर पैक्स कर्मचारियों को जानबूझकर हड़ताल की ओर धकेला गया है क्योंकि ऐसा आज से पहले कभी नहीं हुआ।

वादाखिलाफी से भडक़े पैक्स कर्मचारी

सामान्य दिनों में भी हड़ताल के नोटिस पर संगठन के नेताओं को बुलाकर बातचीत के माध्यम से हल निकाला जाता रहा है। पिछले साल भी ऐसा हो चुका है, लेकिन दो साल से केबिनेट मंत्री बनने की इच्छा पाले बैठे सहकारिता राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गौतम दक या उनके सहकारी अफसरों द्वारा जो वादे, पैक्स कर्मचारी संगठनों से किये गये थे, उन्हें पूर्ण करने का रत्तीभर भी प्रयास नहीं किया गया, जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि साजिशपूर्ण ढंग से पैक्स कर्मचारियों को भजनलाल सरकार के खिलाफ खड़ा किया गया है। पैक्स कर्मचारियों के साथ सहकारी विभाग व मंत्री की वादाखिलाफी और लाखों अवधिपार ऋणियों की सरकार के प्रति नाराजगी, आगामी पंचायत राज चुनावों में, भजनलाल सरकार और भाजपा, दोनों को ही भारी पडऩे वाली है।

पैक्स व सीसीबी पर पड़ेगा गंभीर असर

पैक्स कर्मचारियों के कार्य बहिष्कार का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि इससे पैक्स और केंद्रीय सहकारी बैंकों की आर्थिक स्थिति भी खराब होने वाली है। पांच केंद्रीय सहकारी बैंकों को नाबार्ड पहले ही पुनर्वित्त देने से इंकार कर चुका है। वर्तमान में हालत यह है कि खरीफ सीजन की 3000 करोड़ रुपये से अधिक राशि की ऋण वसूली बकाया है और वित्तीय वर्ष को समाप्त होने में केवल 2 दिन शेष हैं। राज्य सरकार किसानों को जो 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान देती है, उसमें से 2 प्रतिशत पैक्स को पासऑन किया जाता है, इस बार ऋण वसूली कम होने से पैक्स को मिलने वाली राशि भी घटेगी, जिससे पैक्स कार्मिकों को वेतन-भत्तों की दिक्कत आयेगी, साथ ही, केंद्रीय सहकारी बैंकों का मुनाफा भी प्रभावित होगा।

सभी 29 सहकारी बैंकों का घाटे में आना तय

ऋण माफी पेटे ब्याज राशि का सरकार द्वारा भुगतान नहीं किये जाने और आरबीआई के निर्देशानुसार, सरकार से अप्राप्त राशि का, बैंक के बही-खातों में शत-प्रतिशत प्रावधान किये जाने से पहले ही कई केंद्रीय सहकारी बैंक घाटे में जा चुके हैं। यदि 3000 हजार करोड़ रुपये की ऋण वसूली नहीं हुई तो लाखों किसानों के डिफाल्टर होने के साथ-साथ, प्रदेश के समस्त 29 केंद्रीय सहकारी बैंकों का घाटे में आना तय है। पिछले साल कुछ केंद्रीय सहकारी बैंकों ने ऋण माफी एवजी राशि प्रावधान नहीं किया था, जिससे वे घाटे में आने से बच गये थे, यदि इस बार भी सरकार से यह राशि प्राप्त नहीं हुई और बैंकों को शत-प्रतिशत राशि का प्रावधान करना पड़ा तो अल्पकालीन साख संरचना के अंतर्गत ब्याजमुक्त फसली ऋण पर पूरी तरह से निर्भर केंद्रीय सहकारी बैंकों को बड़ा आर्थिक झटका सहन करना होगा। इसके छींटे सहकारिता राज्यमंत्री गौतम दक के दामन तक भी आयेंंगे। (दोनों फोटो फेसबुक से साभार)

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