
सहकारी लश्कर का नेतृत्व करेंगे वयोवृद्ध और वृद्ध अफसर
सहकार भारत
बीकानेर, 17 सितंबर। सहकारिता विभाग के राज्यमंत्री गौतम कुमार दक और शासन सचिव एवं सहकारिता रजिस्ट्रार डॉ. समित शर्मा के एक निर्णय ने विभाग के कार्यरत लगभग 400 सहकारी अफसरों की निष्ठा, काबलियत और कर्तव्यपरायणता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। प्रश्न चिन्ह इसलिए क्योंकि राज्य सहकारिता सेवा के अतिरिक्त पंजीयक (सीनियर स्केल) कैडर से लेकर सहायक पंजीयक कैडर तक के लगभग 400 अधिकारी विभाग में एवं सहकारी संस्थाओं में प्रतिनियुक्ति पर नियोजित हैं परन्तु अब सहकारिता मंत्री और शासन सचिव के लिए सलाहकार के रूप में सेवानिवृत्त अधिकारियों को विभाग में वापस बुलाया जा रहा है।
इसमें इन्दर सिंह गुर्जर, संजय पाठक और पंकज भानू सिंह गोगावत के नाम प्रमुख हैं। संजय पाठक को फिर से शासन सचिव के मुख्य सलाहकार के रूप में मनोनीत किये जाने की चर्चा है जबकि पंकज भानू सिंह गोगावत पूर्व की भांति सहकारी मंत्री के स्टाफ के रूप में सेवाएं देंगे। इन्दर सिंह को सहकारी शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (रायसेम) में नियोजित किए जाने की चर्चा है। सूत्रों की मानें तो ये अधिकारी संविदा पर फिर से विभाग में अपनी सेवाएं देंगे। रजिस्ट्रार कार्यालय के परिपत्र के अनुसार, इनमें से प्रत्येक को 30-40 हजार रुपए मासिक पारिश्रमिक मिल सकता है।
अब सवाल ये है कि विभाग में पहले भी बीसियों अधिकारी सेवानिवृत्त हुए। सहकारी कानून के गूढ़ जानकार कुमार विवेकानंद जैसे सज्जन अधिकारी को विभाग ने वापिस लेने की नहीं सोची, लेकिन तीस साल की सर्विस में, शून्य उपलब्धि वाले अफसरों को वापिस बुलाया जाना, निश्चित रूप से अचरज भरा कदम है। यह निर्णय विभाग के अधिकारियों को हतोत्साहित करने के साथ-साथ शासन सचिव डॉ. समित शर्मा की प्रेरणादायक व्यक्तित्व की छवि के अनुकूल भी नहीं कहा जा रहा।
हनुमानगढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक में दो साल पहले तत्कालिन मुख्य प्रबंधक संजय शर्मा को सहकारी गोदामों की एवज में वसूली करके लौटते हुए 8 लाख रुपए नगदी सहित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा पकड़ा गया था, तब तत्कालिन सहकारिता रजिस्ट्रार मंजू राजपाल ने इस प्रकरण की गहराई से जांच करवाने पर पाया कि 500 मीट्रिक टन के गोदाम की इस योजना को केवल भ्रष्टाचार से धन अर्जन के लिए इन्दर सिंह गुर्जर (तत्कालिन अतिरिक्त पंजीयक, प्रोसेसिंग) बलविन्दरसिंह गिल (तत्कालिन प्रबंध निदेशक, कोटा केंद्रीय सहकारी बैंक) द्वारा डिजाइन किया गया था और इस योजना में अधिकतम गोदामों की मंजूरी भी केवल श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ एवं कोटा जिलों में दी गई थी।
भ्रष्टाचार के इस प्रकरण के पश्चात, हनुमानगढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक के तत्कालिन प्रबंध निदेशक सुरेश कुमार मीणा को पहले निलंबित किया गया, जब वे हाईकोर्ट से स्टे ले आए तो उन्हें क्षेत्रीय अंकेक्षण अधिकारी, भरतपुर के पद पर लगा दिया गया। इसी मामले में इन्दर सिंह को प्रधान कार्यालय, जयपुर से निर्वासित कर, राज्य सहकारी संघ, जयपुर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर लगाया गया था। इन दोनों के लिए यह पनिशमेंट पोस्टिंग थी। संघ में पोस्टिंग के दौरान इन्दर सिंह को अपने सेवाकाल के अंतिम महीने, सोफे पर लेटे-लेटे, और अपनी चौकड़ी के साथ, मंत्री व रजिस्ट्रार के बारे में अनाप-शनाप बातें करते हुए निकालने पड़े। हालांकि, सेवानिवृत्ति के बाद भी कई सप्ताह तक वे नियमित रूप से सहकार भवन में देखे गए, सुबह 10 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक। सुरेश मीणा, तब से लेकर आज तक भरतपुर में ही हैं।
इस प्रकरण में तीसरा नाम बलविन्दर सिंह गिल का था, जो तब उत्तराखंड राज्य सहकारी बैंक में प्रबंध निदेशक के रूप में जाना चाहते थे, जिसके लिए उन्हें सहकारिता विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र की जरूरत थी, लेकिन मंजू राजपाल ने गोदाम रिश्वत प्रकरण में गिल की संदिग्ध भूमिका को देखते हुए एनओसी के आवेदन को खारिज कर दिया।
कोटा केंद्रीय सहकारी बैंक में प्रबंध निदेशक के पद पर सात साल तक नियोजित रहने के बाद, बैंक को 40 करोड़ रुपये के घाटे में डूबाने वाले बलविन्दर सिंह गिल अब प्रधान कार्यालय, जयपुर में अतिरिक्त पंजीयक (बैंकिंग) के पद पर कार्यरत हैं। इस सीट पर बैठने का सबसे बड़ा लाभ यही होगा कि वे कोटा सीसीबी मेें अपनी कारगुजारियों को सफलतापूर्वक ढांप सकेंगे। इसके बाद, उनका लक्ष्य जयपुर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक है। शायद इसलिए कोटा से जयपुर आने के बाद उन्होंने जयपुर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के प्रधान कार्यालय के पास अपना आशियाना बनाया है।
संभावित वापसी वाले दूसरे अधिकारी संजय पाठक हैं, जो 31 अगस्त 2026 को राजकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति से पहले तक वे रायसेम में निदेशक के पद पर कार्यरत थे और राज्य सहकारी भर्ती बोर्ड में पदेन सचिव भी थे, लेकिन अपने कार्यकाल में संजय पाठक ने केंद्रीय सहकारी बैंकों में व्यवस्थापकों के 20 प्रतिशत कोटे से बैंकिंग सहायक की भर्ती, केंद्रीय सहकारी बैंकों में लोन सुपरवाइजर की भर्ती और अरबन को-ऑपरेटिव बैंकों में विभिन्न कैडर के पदों पर सीधी भर्ती की फाइल की ओर झांक कर भी नहीं देखा जबकि इन तीन भर्तियों से संबंधित समस्त औपचारिकताएं पूर्ण हो चुकी थी, लेकिन पाठक ने भर्ती की विज्ञप्ति जारी नहीं की।
राजकीय सेवा के अंतिम महीनों में शासन सचिव डॉ. समित शर्मा का अतिसुरक्षित सान्निध्य पाकर वे निहाल ही हो गए। शर्मा के मुख्य सलाहकार के रूप में धौंस जमाते रहने के कारण ही संजय पाठक ने विभागीय अधिकारियों की असोसिएशन के चुनाव नहीं करवाए जबकि अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल 2025 में ही समाप्त हो गया था। इससे पहले, वे अपेक्स बैंक में प्रबंध निदेशक के रूप में, बैंक के कामकाज में पारदर्शिता का गला घोंटने का काम भी कर चुके हैं। पाठक के प्रबंध निदेशक बनने से पहले अधिकांश फाइलें ऑनलाइन चलाई जाती थी, लेकिन पाठक ने ज्वाइनिंग के तुरंत बाद सारा काम ऑफलाइन कर दिया।
पाठक के एमडी, अपेक्स बैंक के कार्यकाल के दौरान ही बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक में गोपाल क्रेडिट कार्ड योजना में ऋण वितरण के नाम पर बड़ी अनियमितताएं हुई। वे इस पर अंकुश लगाने में पूरी तरफ विफल रहे। गोपाल क्रेडिट कार्ड में अंधाधुंध ऋण वितरण होता रहा। इस मामले में सरकार ने बाड़मेर बैंक के तत्कालिन प्रबंध निदेशक वासुदेव पालीवाल को निलम्बित किया था, जो तक निलम्बित हैं, लेकिन पाठक कार्यवाही से बच गया। पाठक के कार्यकाल में ही पैक्स कम्प्यूटराइजेश प्रोजेक्ट की गति मंद पड़ गई थी।
एक अन्य अधिकारी पंकज भानू सिंह गोगावत हैं, उनके प्रोफाइल में भी ऐसे चांद-तारे नहीं जड़े हुए, जिनकी चमक से चकाचौंध होकर उन्हें ससम्मान वापिस बुलाया जा रहा हो।
विभाग में अत्यंत गुणवान, होनहार और बुद्धिमान अधिकारियों की मौजूदगी में, ऐसे तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों, जिनकी सेवाकाल की उपलब्धि शून्य और निष्ठा संदिग्ध है, की वापसी से सवाल उठने तय हैं। ये सवाल मंत्री और शासन सचिव को भविष्य में परेशान कर सकते हैं।
क्या जोधा से मिली प्रेरणा!
सहकारिता विभाग ने पिछले दो साल से सहकार से ‘समृद्धि की जिम्मेदारी’ एक 70 साल के वृद्ध व्यक्ति आरएस जोधा को दे रखी है। विभाग में 65 साल से अधिक आयु वाले सेवानिवृत्त राजकीय कर्मचारियों, अधिकारियों को संविदा पर रखा जाना प्रतिबंधित है और रजिस्ट्रार कार्यालय के परिपत्र/आदेश के बाद, विभिन्न केेंद्रीय सहकारी बैंकों में नियोजित 65 साल से अधिक आयु वाले रिटायर्ड बैंक कर्मचारियों को तुरंत प्रभाव से हटाया जा चुका है, परंतु जोधा के मामले में यह नियम लागू नहीं होता। जोधा, नाबार्ड से रिटायर्ड हैं और सेवानिवृत्ति के बाद, 5 साल से अधिक समय तक राजीविका (महिला निधि) में सेवाएं दे चुके हैं। उसके बाद, दो साल से सहकारिता विभाग में हैं। सहकारिता मंत्रालय, भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सहकार से समृद्धि के प्रभारी हैं। जोधा, वीडियो कांफ्रेसिंग में शासन सचिव/रजिस्ट्रार की मौजूदगी में वरिष्ठ सहकारी अधिकारियों को लताडऩे से भी नहीं चूकते।






