सहकारी कर्मचारी आंदोलन को नेताओं का अहंकार और मीडिया की उपेक्षा ले डूबी

सहकार भारत

बीकानेर, 23 अप्रेल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री हैं। भाजपा और देश को आगे बढाने के लिए और अपनी छवि के व्यापक विस्तार के लिए वे दिन-रात अथक परिश्रम करते हैं। मोदी जी की गिनती ग्लोबल लीडर्स में होती है, फिर भी वे कहीं भी जाते हैं, तो मीडिया को प्राथमिकता एवं पूरे महत्व के साथ लेकर जाते हैं। उनके एक-एक पल को मीडिया कवर करता है। यही कारण है कि नयी युवा पीढ़ी में मोदी जी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। दूसरी ओर, हमारे सहकार नेता हैं, जो तीन असफल आंदोलनों के बावजूद स्वयं को मोदी जी से बड़ा नेता मान रहे थे। सहकारी सोसाइटी कर्मचारियों के हित के लिए और अपने आंदोलन की सफलता के लिए इन्हें कभी मीडिया की जरूरत महसूस नहीं हुई, जिसका परिणाम एक और विफल आंदोलन के रूप में आया है।

दरअसल, राजस्थान के ग्राम सेवा सहकारी समितियों के कर्मचारी संगठनों की अगुवाई करने वाले नेताओं को यही गलतफहमी ले डूबी कि वे अब बहुत बड़े नेता हो गये हैं। हालांकि, ये ही तथाकथित बड़े नेता सहकारी अधिकारियों द्वारा आम की तरह चूस लिये जाने के बाद, गुठली की भांति फेंक दिये गये हैं। पैक्स कर्मचारियों की एक भी मांग माने बिना, सरकार और सहकारी विभाग की समस्या का समाधान हो गया और एक ऐसा आंदोलन जो सरकार के लिए सिरदर्द साबित हो सकता था, उसको खुद नेताओं ने ही कुचल दिया।

टुच्चे यू-ट्यूब चैनल वालों और रसीद काटने वाली गैंग के झांसे में आ जाने के कारण इन स्वयं-भू नेताओं के रोम-रोम में ये अहंकार भर गया कि अब उन्हें सहकारी विभाग और पैक्स कार्मिकों की मान्यता मिल गयी है। इसी आत्ममुग्धता में इन्होंने मीडिया की जरूरत ही नहीं समझी। यही कारण रहा कि किसी बड़े दैनिक समाचार पत्र, किसी इलेक्ट्रिोनिक मीडिया या सहकारिता के मेन स्ट्रीम मीडिया में इस आंदोलन की एक लाइन की खबर नहीं आयी। कुछ जिलों या कस्बों की खबरें, स्थानीय समाचार पत्रों या बड़े समाचार पत्रों के स्थानीय एडिशनों में जरूरी छपी होंगी, लेकिन जयपुर में किसी बड़े मीडिया हाउस ने अथवा सहकारी जगत में पढ़े जाने वाले किसी मीडिया ने दो लाइन का समाचार प्रकाशित/प्रसारित नहीं किया। टुच्चे से मीडिया/सोशल मीडिया वालों को जहां-तहां लेकर ढोते रहे, जिनकी कहीं गिनती नहीं या जिनका कभी नाम भी रजिस्ट्रार ऑफिस/नेहरू सहकार भवन/शासन सचिवालय अथवा मुख्यमंत्री कार्यालय में किसी ने नहीं सुना होगा।

ऐेसे दोयम दर्जे के तथाकथित मीडिया के साथ, जो खबरें कम और विज्ञापन अधिक छापते हैं, सोसाइटियों से चंदा उगाहने और सोसाइटी-सोसाइटी डोलते हुए रसीदें काटने में सतत संलग्न रहते हैं, ऐसे लोगों के भरोसे प्रदेशव्यापी आंदोलन का सत्यानाश कर लिया। यदि पैक्स कर्मी या उनके नेता, इन यू-ट्यूब मीडिया वालों के चैनल एक बार देखा होता तो उन्हें पता पड़ेगा कि उनके समाचार वाला वीडियो मुट्टी भर लोगों ने भी नहीं देखा, तो शायद वे इन्हें पास में ही नहीं फटकने देते, परंतु नेता तो अपनी फोटो और वीडियो देखकर ही इतने आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि खुद ही सोसाइटियों की रसीदेें कटवाने की सिफारिश करते हैं। ऐसे आत्ममुग्ध नेताओं के दम पर तो सहकारी सोसाइटी कर्मचारियों का कभी भला नहीं हो सकेगा।

पैक्स कर्मचारियों का आंदोलन समाप्त करने की पटकथा एक दिन पहले ही लिखी जा चुकी थी….

ग्राम सेवा सहकारी समिति कर्मचारियों का आंदोलन समाप्ति की ओर…

सहकारिता रजिस्ट्रार पर कानूनी बंदिशें लगाने वाले सोसाइटी अध्यक्ष को अधिनियम अंतर्गत जांच में क्लीन चिट

 

 

 

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